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मिनी IAS का परिचय
कहते हैं कि सचिवालय के विभागों में
दो ही पद सबसे शक्तिशाली माने जाते हैं – एक असली IAS और दूसरा... मिनी IAS, जिसे दुनिया सहायक प्रशाखा पदाधिकारी (Assistant Section Officer) के नाम से जानती है, पर विभागीय गलियारों में यह पद अपनी “मिनी IAS” पहचान से ज्यादा प्रसिद्ध है।
इस पद की महिमा अपरम्पार है। जैसे ही कोई व्यक्ति सहायक प्रशाखा
पदाधिकारी बनता है, उसकी चाल में IAS जैसी अकड़ आ जाती है, कलम को ऐसे घुमाता है जैसे किसी
राज्य का भाग्य लिख रहा हो। सरकारी फ़ाइलें उसके हाथ में ऐसे काँपती हैं जैसे
छात्र परीक्षा में प्रिंसिपल को देखकर काँपता है।
मिनी IAS बनते ही सबसे पहले व्यक्ति को दो चीजें मिलती हैं — एक “संचिका” और दूसरा
“रौब”। संचिका पर जो टिप्पणी लिखने का जो सुख है, वह तो मानो रवींद्रनाथ टैगोर को “गीतांजलि” लिखने
में भी नहीं मिला होगा।
और रौब? पूछिए मत।
लिपिक से लेकर अधिकारी तक सभी को “संचिका कहाँ है?" की वक्र दृष्टि से
देखना अब इनका नैतिक अधिकार बन जाता है।
सहायक प्रशाखा पदाधिकारी को संचिका
आगे बढ़ाने या रोकने का जो अधिकार प्राप्त है, वह किसी ट्रैफिक हवलदार को सिग्नल कंट्रोल करने से भी अधिक शक्तिशाली बनाता
है।
अगर किसी अधिकारी की संचिका अटक
जाए, तो लोग कहते हैं – “लगता है
मिनी IAS साहब नाराज़ हैं।”
मीटिंगों में ये साहब अपने नोट्स
कुछ ऐसे बनाते हैं मानो नीति आयोग की रिपोर्ट लिखी जा रही हो।
कोई पूछे – "कौन से विभाग से
हैं?"
तो जवाब आता है – "हम वही
हैं जो IAS वाले सचिवालय में
बैठते हैं, और संचिका से राज्य
की नीतियाँ तय करते हैं।“
वेतन थोड़ा सा ही कम होता है, लेकिन “प्रतिष्ठा” प्रचुर मात्रा
में होता है।
कार्यालय में नया
पदस्थापन हुआ तो पूरा विभाग सोचता है –
“अब सुधार होगा”। और कुछ महीनों में ही सब समझ जाते हैं कि सुधार सिर्फ फाइलों की
बाइंडिंग और कवर पेज पर सीमित रहेगा।
कुल मिलाकर, सहायक प्रशाखा पदाधिकारी यानी मिनी
IAS वह प्राणी है जो एक ही समय में
बाबू भी है, पदाधिकारी भी है, और अपने मन से न्यायाधीश भी।
इनकी कलम चलती नहीं, फैसले सुनाती है ।
अब वो अलग बात हुई कि इनके समीप बैठे संगणक परिचालक महोदय
इनकी नहीं सुनते ।
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