रविवार

अध्याय-03 : महिला मिनी IAS

 

- 3 -
महिला मिनी
IAS

 

एक महिला मिनी IAS जिनका नाम शीला था।     
जवाबदार, सुशिक्षित, दक्ष – और विभाग की इकलौती महिला मिनी IAS
उन्हें देखकर सहकर्मी अक्सर कहते – "इनकी तो अलग ही सरकार चलती है!"

सुबह 10:30 पर ऑफिस पहुंचने वाली शीला जी 4:30 बजे की टिकट कटवाकर निकल जाती थीं, जबकि बाक़ी लोग 5:30 या 6 तक बैठे फाइलों में उलझे रहते।

पूछो तो जवाब सीधा – "सरकारी नियम है, महिला पदाधिकारी हैं, एक घंटे पहले जाने का अधिकार है।"

महीने में दो अतिरिक्त छुट्टियाँ, जो केवल महिलाओं को मिलती थीं, शीला जी पूरी रचनात्मकता के साथ सप्ताहांत, राजपत्रित अवकाश या CL के साथ जोड़कर लम्बी छुट्टियों का महायोग बना देतीं।

बाकी मिनी IAS दाँत पीसकर बस छुट्टी अवकाश स्वीकृति  की संचिका और पंजी देखते रहते।

अब यह बात सही थी कि महिला कर्मचारियों को कुछ विशेष सुविधाएँ मिलनी ही चाहिए – सुरक्षा, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और सामाजिक संरचना की वजह से

पर शीला जी ने इसे "सुविधा से अधिकार और अधिकार से विशेषाधिकार" बना दिया था।

दिक्कत तब होती थी जब उनके प्रभार की संचिकायें अधूरी रह जातीं।

एक बार एक वरीय अधिकारी ने टोक दिया –
"ये प्रतिवेदन कल तक चाहिए था, आप तो छुट्टी पर थीं?"
शीला जी मुस्कुराईं:

 "सर, मैंने मेल कर दिया था… और बाकी तो प्रशाखा पदाधिकारी महोदय को बता दिया था।"

किसी ने कहा भी – "अगर यही काम पुरुष अधिकारी करता, तो चार बार स्पष्टीकरण  निर्गत हो  जाता!"

अब संगठन में कुछ बुजुर्ग मिनी IAS तो इस व्यवस्था को 'नारी सशक्तिकरण' का सजीव उदाहरण मानते थे।

मगर कुछ नवोदित कर्मचारी फुसफुसाते –
"काम बराबर हो, छुट्टी बराबर हो। सुविधा नहीं, समता चाहिए।"

फिर भी शीला जी पर कोई दबाव नहीं था।

न कोई मौखिक टोक, न ही संचिका लौटाई जाती, न ही ‘अविलंब विमर्श’ की पीड़ा ।

एक दिन एक पुरुष मिनी IAS ने हिम्मत करके कहा –
"मैडम, संचिका कल आप ही के पास थी…"
शीला जी बोलीं:

"मैं तो कल 'आंतरिक परिवाद समिति' की बैठक में थी, ज़रा विभागीय संवेदनशीलता को समझिए।"

अब भला कोई क्या कहता?

 

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अध्याय-02 : मिनी IAS की दिनचर्या

 

- 2 -
मिनी
IAS की दिनचर्या

 

सुबह के 11 बज चुके हैं...

लेकिन कार्यालय की कुर्सी अभी भी खाली है। सामने की टेबल पर चाय का पुराना दाग और एक अधूरी संचिका मूकदर्शक बनकर प्रतीक्षा कर रहे हैं। तभी दरवाजे की चरमराहट होती है, और पधारते हैं — मिनी IAS, यानि हमारे प्रिय सहायक प्रशाखा पदाधिकारी!

11:05 AM

"अरे ट्रैफिक बहुत था यार!" – पहली आवाज़ , जो उनके हर दिन की शुरुआत का स्थायी वाक्य होता है। देश की जीडीपी चाहे बढ़े न बढ़े, लेकिन उनके देर से आने की वजह हमेशा "ट्रैफिक" ही रहता है — वो भी दो किलोमीटर के अंदर।

11:30 AM–
अब संचिकाओं की “समीक्षा” शुरू होती है। तीन संचिका खोली जाती हैं, दो को बंद कर दिया जाता है, और एक को देखकर माथा सिकोड़ते हुए कहा जाता है–

" इसमें कुछ गड़बड़ है... पहले इस पर दो मीटिंग कर लेते हैं।"

12:15 PM –

जरा एक कप चाय लाना... थोड़ा कड़क।”

चाय पीते-पीते मोबाइल पर देश की समसामयिकी का आभासी दर्शन किया जाता है और फिर उसके आधार पर कनीय कर्मियों के समक्ष  "देश की गिरती व्यवस्था" पर व्याख्यान प्रस्तुत किया  जाता है।

1:00 PM –

आज लंच थोड़ा जल्दी कर लेते हैं... भूख लग रही है।“

अब शुरू होता है लंच ब्रेक – जो आधिकारिक तौर पर 30 मिनट का है, लेकिन मिनी IAS के लिए यह “मानवाधिकार” की तरह है – सीमाओं से परे।

2:15 PM –

लौटते हैं, थोड़े थके हुए, थोड़े तृप्त।

फिर शुरू होती है “स्मरण शक्ति का अभ्यास” – यानि पुरानी संचिकाओं पर लंबी फेंक ।”

 "जब हम पुराने  सचिवालय के निगरानी शाखा में थे, तब एक संचिका आई थी जो 200 पृष्ठों की थी... मैंने एक दिन में निपटा दी!"

सामने बैठे कनीय कर्मचारी की आंखें फटी की फटी रह जाती हैं — वो भूल जाता है कि आज की केवल दो पृष्ठों वाली संचिका पिछले चार दिन से लटकी हुई है।

3:30 PM –

अब व्हाट्सएप, रील्स, न्यूज पोर्टल और ऑफिस की गपशप का समय।

बीच-बीच में एक-दो फोन भी आते हैं, जिनमें अधिकतर यह बताया जाता है कि "बहुत व्यस्त हूं, फाइलें बहुत हैं।”

4:15 PM –

अब निकलने की तैयारी। टेबल को व्यवस्थित किया जाता है, कलम को ढक्कन में बंद किया जाता है (जैसे तलवार म्यान में जा रही हो), और एक बार फिर ऐलान होता है –"कल से पूरी गति से काम होगा। आज तो बहुत मीटिंग्स थीं!“

5:00 PM –

दफ्तर के अन्य कर्मी अभी भी काम में डूबे हैं, और हमारे मिनी IAS साहब मुस्कुराते हुए कार्यालय से पुनः एकबार चाय पीने निकलते हैं —

चेहरे पर वही आत्मविश्वास, जैसे कोई मंत्री सदन से बहस जीतकर निकल रहा हो।

                     इसप्रकार  सहायक प्रशाखा पदाधिकारी की दिनचर्या देखकर समझ आता है कि मिनी IAS का जीवन वास्तव में संतुलन और "मैनेजमेंट" का उत्तम उदाहरण है — समय का मैनेजमेंट, संचिका को टालना, और जिम्मेदारी का ज्ञाप प्रारूप अथवा पीतपत्र लगाकर हस्तांतरण।

 

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अध्याय - 01 : मिनी IAS का परिचय

 

- 1 -
मिनी
IAS का परिचय

 

कहते हैं कि सचिवालय के विभागों में दो ही पद सबसे शक्तिशाली माने जाते हैं – एक असली IAS और दूसरा... मिनी IAS, जिसे दुनिया सहायक प्रशाखा पदाधिकारी (Assistant Section Officer) के नाम से जानती है, पर विभागीय गलियारों में यह पद अपनी “मिनी IAS” पहचान से ज्यादा प्रसिद्ध है।

इस पद की महिमा अपरम्पार  है। जैसे ही कोई व्यक्ति सहायक प्रशाखा पदाधिकारी बनता है, उसकी चाल में IAS जैसी अकड़ आ जाती है, कलम को ऐसे घुमाता है जैसे किसी राज्य का भाग्य लिख रहा हो। सरकारी फ़ाइलें उसके हाथ में ऐसे काँपती हैं जैसे छात्र परीक्षा में प्रिंसिपल को देखकर काँपता है।

मिनी IAS बनते ही सबसे पहले व्यक्ति को दो चीजें मिलती हैं — एक “संचिका” और दूसरा “रौब”। संचिका पर जो टिप्पणी लिखने का जो सुख है, वह तो मानो रवींद्रनाथ टैगोर को “गीतांजलि” लिखने में भी नहीं मिला होगा।

और रौब? पूछिए मत।

लिपिक से लेकर अधिकारी तक सभी को “संचिका कहाँ है?" की वक्र दृष्टि से देखना अब इनका नैतिक अधिकार बन जाता है।

सहायक प्रशाखा पदाधिकारी को संचिका आगे बढ़ाने या रोकने का जो अधिकार प्राप्त है, वह किसी ट्रैफिक हवलदार को सिग्नल कंट्रोल करने से भी अधिक शक्तिशाली बनाता है।

अगर किसी अधिकारी की संचिका अटक जाए, तो लोग कहते हैं – “लगता है मिनी IAS साहब  नाराज़ हैं।”

मीटिंगों में ये साहब अपने नोट्स कुछ ऐसे बनाते हैं मानो नीति आयोग की रिपोर्ट लिखी जा रही हो।

कोई पूछे – "कौन से विभाग से हैं?"

तो जवाब आता है – "हम वही हैं जो IAS वाले सचिवालय में बैठते हैं, और संचिका से राज्य की नीतियाँ तय करते हैं।“

वेतन थोड़ा सा ही कम होता है, लेकिन “प्रतिष्ठा” प्रचुर मात्रा में होता है।

कार्यालय में नया पदस्थापन  हुआ तो पूरा विभाग सोचता है – “अब सुधार होगा”। और कुछ महीनों में ही सब समझ जाते हैं कि सुधार सिर्फ फाइलों की बाइंडिंग और कवर पेज पर सीमित रहेगा।

कुल मिलाकर, सहायक प्रशाखा पदाधिकारी यानी मिनी IAS वह प्राणी है जो एक ही समय में बाबू भी है, पदाधिकारी भी है, और अपने मन से न्यायाधीश भी।

इनकी कलम चलती नहीं, फैसले सुनाती है ।

अब वो अलग बात हुई कि इनके समीप बैठे संगणक परिचालक महोदय इनकी नहीं सुनते

 

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अस्वीकरण और अनुक्रमणिका

मिनी IAS : फाइलों के बीच एक पदाधिकारी

!!अस्वीकरण (Disclaimer)!!

प्रिय पाठकगण,       

प्रस्तुत रचना में जो कुछ भी  है, वह पूर्णतः व्यंग्य है – अर्थात हास्य  भी है, मगर विचारनीय भी! इसमें दिखते पात्र, पद, फाइलें, कुर्सियाँ और वो मशहूर 'मिनी IAS' — सब या तो कल्पना से आए हैं, या दफ्तर की दीवारों से झाँकते सच से।

** अगर इसमें कहीं आपको अपना अक्स दिखाई दे जाए, तो इसे दर्पण समझिए, दोष नहीं!😄

**लेखक का मक़सद किसी की आलोचना नहीं, बस सरकारी ज़िंदगी की झलक को हँसते-हँसते दिखाना है।

**कृपया इसे व्यक्तिगत न लें, पद की गरिमा बनी रहे, संगठन की प्रतिष्ठा बची रहे — और अगर कुछ बात दिल को छू जाए, तो हँस लीजिए... या सोच लीजिए!

                                                                                 — एक मिनी IAS

 

Website :             https://About.me/MiniIAS

Online Blog :      https://MiniIAS.blogspot.com

 

प्रकाशन वर्ष  : 2025

नए टॉपिक और संशोधन हेतु सुझाव सादर आमंत्रित हैं ।

अनुक्रमणिका

क्र० सं०

शीर्षक

पृष्ठ संख्या

1

मिनी IAS का परिचय

3

2

मिनी IAS की दिनचर्या

5

3

महिला मिनी IAS

10

4

विमर्श वाली संचिका

13

5

मिनी IAS बनाम असली IAS

17

6

मिनी IAS का राजकीय उत्कर्ष

21

7

PCS बनाम मिनी IAS

25

8

मिनी IAS की सेवानिवृत्ति

28

9

सेवांत लाभ का चक्कर

32

10

नव नियुक्त मिनी IAS

36

11

संगठन , सम्मान और सन्नाटा

40

12

संघ का चाय समारोह

44

13

डिजिटल सचिवालय

49

14

प्रशिक्षण काल

53

15

संचिका, टिप्पणी और पूर्णविराम

57






अध्याय-03 : महिला मिनी IAS

  - 3 - महिला मिनी IAS   एक महिला मिनी IAS जिनका नाम शीला था।       जवाबदार , सुशिक्षित , दक्ष – और विभाग की इकलौती महिला मिनी IAS ।...